हर तरह का पब्लिक है ! (पटना ४)
गाँधी मैदान !... गाँधी मैदान !... गाँधी मैदान ! ‘गाँधी मैदान हैं ?’ एक ऑटो वाले ने बिल्कुल सामने ऑटो खड़ा करते हुए पूछा. स्टेसन !... स्टेसन !... स्टेसन ! ‘जक्सन हैं?’ एक दूसरे ऑटो वाले ने मेरे और पहले...
View Articleखतरनाक मस्त ! (पटना ५)
जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से एक बार फिर निकालना हुआ और इस बार एक 'आइये भैया ! ऑटो होगा?' का जवाब मैंने 'हाँ' से दिया. 'भैया, जो सही किराया हो आप बता दो, कुछ ऐसा मत बोल देना कि मुझे मना...
View Articleसबका कारण एक है !
ओढ़निया ब्लॉगिंग– बहुत दिनों बाद मजा सा आया इस पोस्ट को पढ़कर। सतीशजी के ब्लॉग पर मैं बहुत कम टिपियाता हूँ बस फीड में पढ़ लेता हूँ लेकिन इस पोस्ट पर दो टिप्पणी लूटा आया। याद आया कानपुर में जब फिल्म...
View Articleलेबंटी चाह (पटना ६)
‘सर, लेबंटी चाह पीएंगे ?’ एक दिन सुबह सुबह फील्ड ट्रिप पर मुझसे किसीने पूछा.‘वो क्या होता है?’ मैंने दिमाग पर जोर डालने के बाद पूछा. ‘सर लाल चाह - लेम्बू डाल के !’ उसने स्पष्ट किया. ‘अरे सर ऊ लेमन टी...
View Articleटाटा की भोलभो (पटना ७)
'सर चलिये न... आज आपको एसी बस से ले चलते हैं' राजेशजी मुझे नयी चमचमाती बस में ले गए। शायद बस का सड़क पर पहला ही दिन था। पुजा के बाद बनाए गए स्वास्तिक का सिंदूर अभी भी बस के शीशे पर मौजूद था और शंकर...
View Articleदुई ठो टइटू (पटना ८)
'हलो, कौन बोल रहे हैं?' - राजेशजी ने उधर से जवाब दिया। 'राजेशजी, मैं अभिषेक बोल रहा हूँ? आप बीजी तो नहीं हैं?' - मैंने संभलते हुए कहा। मुझे याद है एक दिन राजेशजी ने एक मिस्ड कॉल के जवाब में किसी को...
View Articleमाल में माल ही माल (पटना ९)
बीरेंदर भईया उर्फ 'बैरीकूल' से पहली बार चाय की दुकान पर मिलना हुआ था। मुझे अक्सर ऐसा लगता कि वो मुझसे बात करने की कोशिश कर रहा है लेकिन बात हो नहीं पाती थी। बीरेंदर की अपनी पर्सनलिटी है... ऐसी...
View Articleफॉर ईच इन्फाइनाइटेसिमल मूमेंट ऑफ माइ एक्ज़िसटेंस !
(एक पत्र जो कभी भेजा नहीं गया...) नोट:- अगर आप यहाँ तक आ गए हैं और इससे आगे पढ़ने जा रहे हैं तो: बीच में सिर्फ इसलिए ना छोड़ें कि इसमें गणित है। असली बात 'सत्य' है वो गणित का मोहताज नहीं ! गणित के...
View Articleटाइम, स्पेस और एक प्री-स्क्रिप्टेड शो
दृश्य 1: विक्रम संवत 2028, 1971 ईस्वी, अक्षांश 26.xx देशांतर: 82.xx:शुक्ल पक्ष की चांदनी रात के दूसरे पहर किसान पिता ने नवजात के जन्म-समय को चिन्हित करने के लिए जमीन पर एक खूंटी ठोंक दी. उज्जवल...
View Article२०११...
साल 2011 का कुछ-कुछ अपने पास पड़ा रह गया है... वो तो अब वापस लेने आएगा नहीं... ये अब अपने साथ ही रह जाएँगे। हमारा कुछ अगर किसी के पास रह गया होगा तो ये उन्हें पता होगा... हमें याद नहीं। हाँ, हमारे...
View Articleपाँच लीटर दूध और आधा किलो चीनी (पटना १०)
बैरीकूलसे अक्सर चाय की दूकान पर ही मिलना होता था. चार बजे के आस पास, ४ रुपये की चाय. नियमित फोन करता था बैरी – ‘आइये भैया नीचे, चाय पी कर आते हैं’. मुझे उस दूकान की चाय अच्छी लगने लगी थी. बिरेंदर को...
View Articleप्री-स्क्रिप्टेड शो...
(मूल पोस्ट... के बाद आए एक ईमेल और उसके जवाब पर आधारित)अमृत ने जब अगले दिन विजय से बात की... तो विजय ने बताया- देख अमृत, दारू के झोंके में मैंने जो बोला वो बोला। पर मैं जो बोलता हूँ वो कोई नियम नहीं...
View Articleयेनांग विकार: ! (पटना ११)
उस शाम रैली के चक्कर में ऑटो न मिलने का डर था तो बीरेंदर (उर्फ बैरीकूल) मुझे ड्रॉप करने आ गया। पाँच किलोमीटर दूर भी बीरेंदर को जानने वाले लोग मिलते गए। बीरेंदर ने जब कहा था कि अपना इलाका है... तो वो...
View Articleअच्छा-बुरा !
“आप भी ड्रिंक नहीं करते?” – पहली बार सम्बोधन अक्सर ‘आप’ ही होता है। पर ऋचा मुझे हमेशा आप ही बोलती रही। ऑफिस की पार्टी में जब सभी नशे में धुत थे तब संभवतः ऋचा उस भीड़ में अकेली महसूस कर रही थी। या फिर...
View Articleजर गया तेरा बंगला ! (पटना १२)
पिछले दिनों भारत आया तो बैरीकूल का फोन आया। हाल खबर की लेनदेन के बाद बोला - "भईया, गाँव आइये त पक्का से मिलते हैं।" मैंने कहा - "बीरेंदर, देख लो गर्मी का दिन है इतनी दूर आना पड़ेगा तुम्हें। वैसे अगर...
View Articleपुराने बैग से...
‘यात्रा के पहले... समान पैक करते हुए... एटीएम के कुछ पुराने रसीद,म्यूजियम-ज़ू के टिकट और साथ में पाँच-पाँच रुपये के दो बस टिकट,एक कॉफी बिल – एक हॉट दूसरी कोल्ड,बिल कॉफी का है पर उस शाम आइसक्रीम भी खाई...
View Articleसदालाल सिंह (पटना १३)
उस दिन शाम को जब मैं चाय पीने गया तो बीरेंदर उर्फ बैरीकूल फोन पर बात करता हुआ कुछ चिंतित सा दिखा. मैंने पुछा – ‘क्या हुआ बिरेंदर? सब ठीक है?’‘हाँ भईया. आइये. सब ठीके है. ऊ एक ठो मैटरहो गया है' -...
View Articleवो सवाल !
याद है तुम्हे बचपन के वो सवाल? वो धूर्त व्यापारी - जो कीमत बढ़ाकर छूट दे देता था.छूट को बट्टा भी कहते थे न? - अब बस 'डिस्काउंट' कहते हैं. …हर बार पेट्रोल की कीमतें बढ़कर घटते देख - उसकी याद आती है. और...
View Articleहनी जैसी स्वीट, मिर्ची जैसी हॉट (पटना १४)
मैंने पूछा – ‘क्या हुआ बीरेंदर ?’‘कुछ नहीं भईया. आइये. ई साला नया वाला फोन ! जब से लिए हैं पता नहीं दिनों-रात का भीतरे-भीतर अपडेटकरते रहता है ! हम भी कहते हैं - कर जो करना है. जो पूछता है ओके दबा...
View Articleयूँ ही...कुछ परिभाषाएँ !
1॰ पहला 'आल-इन' शाश्वत प्रेम: पार्वती -जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी। तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू। महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि...
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